
अजीत मिश्रा (खोजी)
शिक्षा के नाम पर ‘अवैध’ दुकानदारी, मासूमों के भविष्य से खिलवाड़ कब तक?
- बस्ती मंडल की शर्मनाक तस्वीर: मानकों को ताक पर रखकर दी जा रही शिक्षा, सुरक्षा व्यवस्था राम भरोसे।
- अंधेरे में ग्रामीण: कम जानकारी का फायदा उठाकर अवैध स्कूल में हो रहे नामांकन, विभाग की चुप्पी संदिग्ध।
- क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है? कुदरहा में बेखौफ चल रही ‘अवैध पाठशाला’।
- साहब की मेहरबानी या बड़ी मिलीभगत? बिना मान्यता के ठोकवा में सज रही है शिक्षा की मंडी।
- ग्रामीणों की पुकार: बंद करो अवैध स्कूलों का कारोबार, दोषियों पर हो कड़ी कानूनी कार्रवाई।
ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश)
दिनांक: 12 अप्रैल, 2026
बस्ती। जनपद के कुदरहा विकास खंड अंतर्गत ठोकवा गांव से शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर कालिख पोतने वाली तस्वीर सामने आई है। यहाँ कृष्णा पब्लिक स्कूल के नाम पर शिक्षा का एक ऐसा ‘अवैध किला’ खड़ा किया गया है, जिसकी बुनियाद में न तो कागजी वैधता है और न ही बच्चों की सुरक्षा के प्रति कोई जिम्मेदारी। हैरानी की बात यह है कि यह पूरा खेल खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) की नाक के नीचे चल रहा है, जिससे विभाग की मिलीभगत की बू साफ़ महसूस की जा सकती है।
⚓नाम बदला, फितरत नहीं: पुराने खेल का नया चेहरा
सूत्रों की मानें तो यह वही विद्यालय है जो पहले ‘एस.के. पब्लिक स्कूल’ के नाम से संचालित होता था। जब पुराने नाम पर विवाद बढ़ा या विभागीय शिकंजा कसने का डर हुआ, तो रातों-रात बोर्ड बदलकर इसे ‘कृष्णा पब्लिक स्कूल’ कर दिया गया। लेकिन सवाल वही खड़ा है—क्या बोर्ड बदलने से अवैधता वैध हो जाती है? बिना मान्यता के धड़ल्ले से लग रही कक्षाएं इस बात का प्रमाण हैं कि संचालक को कानून का रत्ती भर भी खौफ नहीं है।
⚓BEO की चुप्पी: संरक्षण या लापरवाही?
स्थानीय ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) के संरक्षण में ही यह अवैध परिसर फल-फूल रहा है। आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी या ‘रसूख’ है जिसके आगे स्थानीय शिक्षा विभाग नतमस्तक है? शिक्षा मानकों को ताक पर रखकर बच्चों को जर्जर और असुरक्षित कमरों में बैठाया जा रहा है।
“ग्रामीण क्षेत्रों की मासूमियत का फायदा उठाकर प्रबंधन उनके बच्चों का नामांकन तो कर लेता है, लेकिन भविष्य में जब इन बच्चों के पास वैध टीसी या मार्कशीट नहीं होगी, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा?”
⚓अंधेरे में ग्रामीण, बेखौफ प्रबंधन
जानकारी के अभाव में भोली-भाली ग्रामीण जनता अपने बच्चों को उज्ज्वल भविष्य की आस में यहाँ भेज रही है। उन्हें नहीं पता कि जिस स्कूल को वे शिक्षा का मंदिर मान रहे हैं, वह तकनीकी रूप से महज एक अवैध ढांचा है। शिकायतों के अंबार के बावजूद अब तक कोई ठोस कानूनी कार्रवाई न होना यह सिद्ध करता है कि तंत्र पूरी तरह से नाकाम हो चुका है या फिर भ्रष्टाचार की चादर ओढ़कर सो रहा है।
⚓मुख्य बिंदु: तंत्र की विफलता के प्रमाण
- मानकों की धज्जियाँ: स्कूल परिसर में न तो सुरक्षा के इंतजाम हैं और न ही पर्याप्त शैक्षिक संसाधन।
- मिलीभगत का संदेह: बिना विभागीय साठगांठ के कोई भी विद्यालय सालों-साल बिना मान्यता के नहीं चल सकता।
- दिखावे की जांच: अब तक की गई जांचें सिर्फ कागजों तक सीमित रहीं, धरातल पर स्कूल आज भी सक्रिय है।
ग्रामीणों ने अब उच्चाधिकारियों से गुहार लगाई है कि इस ‘शिक्षा की दुकान’ पर तत्काल ताला जड़ा जाए और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस अवैध संस्थान पर हंटर चलाता है या फिर ‘कृष्णा पब्लिक स्कूल’ के रूप में मासूमों के भविष्य की बलि चढ़ती रहेगी।





















